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Holi

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Indian festival of colours-  Holi  मनुष्य जीवन प्राप्त प्राणी को शास्त्र विरूद्ध भक्ति साधना पर आरूढ़ हुए असंख युग और जीवन बीत गये,लेकिन जो सतलोक में सुखदायी(Colours) और Holi (खुशहाली) मनाने की वृत्ति आत्मा का अभिन्न हिस्सा बन गया था को यह काल जाल भी समाप्त नहींकर सका ।         परन्तु हमारे Holi मनाने के तरीके समय के साथ परिवर्तित होते गये। सतलोक में हमें बिना कर्म किये वांछित (इच्छित) वस्तु की प्राप्ति हो जाती थी,तो वहां हम राम नाम की Holi उमंग रूपी Colours के साथ मनाते थे।          हमारी इस लोक में सतयुग से कलियुग की तरफ आते-आते शास्त्र विरूद्ध भक्ति साधना में उत्तरोत्तर वृद्धि होती गई और वर्तमान समय में हम शास्त्र विरूद्ध आचरण की अंतिम सीमा पर पहुँच गए हैं ।जहाँ सतलोक में मनाई जाने वाली festival of colours ( Holi) का रूप और तरीका बदल कर हम इस कगार पर पहुँच चूके हैं कि, हमारा आध्यात्मिक और नैतिक रूप से पूर्ण रूपेण पतन हो चूका है।        यदि हमें पुनः वही शाश्वत स्थान और वही राम नाम रूपी Festival of Colour...

दहेज:-एक कुप्रथा

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दहेजप्रथा क्या है-:   अपनी बहन बेेेटियों का निर्जीव वस्त्तुओं के साथ सौदा करना। दहेज एक सामाजिक कुरीति: मनुष्य ने समाज में व्याप्त कुरीतियों को परम्परा के नाम से निर्वहन करते करते अपने सुखी जीवन में आग लगा ली है।   आज एक परिवार अपने घर में बेटी पैदा होने को अभिशाप मानने लग गया है उसका मुख्य कारण है - दहेजप्रथा     प्राचीन समय में अपने रिश्तेदारों को अभावग्रस्त होने पर सहायता करने के रिवाज ने कालान्तर में समय व्यतीत होने के साथ-साथ दहेज रूपी दानव का स्वरूप धारण कर लिया ।  आज एक गरीब व्यक्ति अपनी बेटी के विवाह में दिखावे के लिए अपनी सामर्थ्य से अधिक खर्च करके अपने ऊपर कर्ज कर लेता है जिसे चुकाने में अपनी जिंदगी नरक बना लेता है ।         दहेजप्रथा का उन्मूलन: ऐसे में मनुष्य जीवन का मूल उद्देश्य मोक्ष प्राप्ति करने (जन्म-मरण से मुक्ति) को भूलकर अपनी परम्पराओं के निर्वहन के जाल में उलझकर अनमोल मनुष्य जीवन को खो देता है ।लेकिन ऐसे समय में पूर्ण संत रामपालजी महाराज ने मानव समाज को आध्यात्मिक ज्ञान से परिचित करवाकर नई दिशा प्रदान की है, जिसमे...